राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान : ज्ञान की विरासत बचाने को प्रशासन सक्रिय, डीएम ने बनाई व्यापक रणनीति
राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान : ज्ञान की विरासत बचाने को प्रशासन सक्रिय, डीएम ने बनाई व्यापक रणनीति
लखीमपुर खीरी।
भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में अब लखीमपुर खीरी प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है। शासन के निर्देश पर जिले में “राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान” को मिशन मोड में संचालित किया जा रहा है। इसी क्रम में गुरुवार को कलेक्ट्रेट स्थित अटल सभागार में जिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण वर्चुअल बैठक आयोजित की गई, जिसमें विभिन्न विभागों के अधिकारियों, डिग्री कॉलेजों, संस्कृत विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों के प्रधानाचार्यों ने भाग लिया। बैठक में जिले में संरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों की खोज, संरक्षण और डिजिटलीकरण को लेकर विस्तृत रणनीति तैयार की गई।

बैठक को संबोधित करते हुए जिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह ने कहा कि लखीमपुर खीरी का ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत समृद्ध रहा है। यहां मंदिरों, मठों, आश्रमों, गुरुकुलों, संस्कृत पाठशालाओं, पुस्तकालयों, संग्रहालयों और कई निजी संस्थानों में वर्षों पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां संरक्षित हो सकती हैं, जिनमें भारतीय ज्ञान परंपरा का अनमोल खजाना छिपा हुआ है। ऐसे में इन धरोहरों की पहचान कर उनका संरक्षण करना प्रशासन की प्राथमिकता है।
डीएम ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि गांव स्तर से लेकर नगर निकायों तक व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण अभियान चलाया जाए। उन्होंने कहा कि कई बार लोगों को यह जानकारी भी नहीं होती कि उनके पास रखी पुरानी हस्तलिखित पुस्तकें या दस्तावेज वास्तव में ऐतिहासिक महत्व की पांडुलिपियां हैं। इसलिए जनजागरूकता के माध्यम से लोगों को इस अभियान से जोड़ना बेहद आवश्यक है।

बैठक में पांडुलिपि की परिभाषा और उसके महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों को बताया गया कि पांडुलिपि वह मूल हस्तलिखित रचना होती है, जिसे प्राचीन समय में कागज, ताड़पत्र, भोजपत्र, कपड़े अथवा अन्य पारंपरिक माध्यमों पर लिखा जाता था। ये पांडुलिपियां केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं बल्कि साहित्य, आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित, विज्ञान, इतिहास और दर्शन जैसे अनेक विषयों की अमूल्य जानकारी अपने भीतर समेटे हुए हैं। आधुनिक तकनीक के अभाव वाले समय में यही पांडुलिपियां ज्ञान के संरक्षण और प्रसार का प्रमुख माध्यम थीं।
बैठक में मुख्य विकास अधिकारी अभिषेक कुमार ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि सर्वेक्षण कार्य को गंभीरता से लिया जाए और किसी भी स्तर पर लापरवाही न बरती जाए। उन्होंने कहा कि यह केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है। अधिक से अधिक पांडुलिपियों का विवरण एकत्र कर उन्हें संरक्षित करना आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर साबित होगा।
सीडीओ ने कहा कि कई दुर्लभ पांडुलिपियां समय के साथ नष्ट होती जा रही हैं। नमी, दीमक, खराब रखरखाव और जानकारी के अभाव में ऐतिहासिक दस्तावेज क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। ऐसे में उनका डिजिटलीकरण बेहद जरूरी है, ताकि उनकी सामग्री सुरक्षित रखी जा सके और शोध कार्यों में उपयोग हो सके।
अभियान को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए प्रशासन द्वारा संस्कृति, इतिहास और साहित्य से जुड़े जानकार व्यक्तियों को सर्वेक्षणकर्ता के रूप में नामित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। ये सर्वेक्षक विभिन्न क्षेत्रों में जाकर प्राचीन पांडुलिपियों की पहचान करेंगे और उनका विवरण तैयार करेंगे। इसके साथ ही पांडुलिपियों की स्थिति, भाषा, विषय और संरक्षण की आवश्यकता से संबंधित जानकारी भी एकत्र की जाएगी।

बैठक में पीडी (डीआरडीए) एसएन चौरसिया ने आमजन से विशेष अपील करते हुए कहा कि जिन लोगों के पास प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ, धार्मिक पुस्तकें या अन्य पांडुलिपियां उपलब्ध हों, वे उनकी जानकारी प्रशासन को अवश्य दें। उन्होंने बताया कि विकास भवन स्थित पर्यटन सूचना अधिकारी कार्यालय अथवा मोबाइल नंबर 9450631830 पर सूचना देकर लोग इस महत्वपूर्ण अभियान का हिस्सा बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यह केवल प्रशासन का कार्य नहीं बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी है। यदि लोग आगे आकर अपने पास संरक्षित पांडुलिपियों की जानकारी देंगे तो जिले की ऐतिहासिक धरोहर को बचाने में बड़ी सफलता मिल सकती है।
बैठक में जिला विद्यालय निरीक्षक विनोद कुमार मिश्र, पर्यटन सूचना अधिकारी संजय भंडारी, विभिन्न नगर निकायों के अधिशासी अधिकारी, शिक्षा विभाग के अधिकारी एवं अन्य संबंधित विभागों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।
प्रशासन की इस पहल को जिले की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि अभियान सफल होता है तो लखीमपुर खीरी की कई दुर्लभ और ऐतिहासिक पांडुलिपियां राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकती हैं तथा शोध और अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत सिद्ध होंगी।