June 4, 2026

INDIA गठबंधन में बढ़ी दरार? DMK ने कांग्रेस से अलग बैठने की मांग कर बढ़ाई सियासी हलचल

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INDIA गठबंधन में बढ़ी दरार? DMK ने कांग्रेस से अलग बैठने की मांग कर बढ़ाई सियासी हलचल

राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर INDIA गठबंधन को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। जिस गठबंधन को भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा था, अब उसी में दरार की खबरें सामने आने लगी हैं। गठबंधन की गांठ एक बार पड़ जाए तो उसे खोलना आसान नहीं होता, लेकिन INDIA Alliance अब दोबारा मजबूत होने से पहले ही बिखरता नजर आने लगा है।

ताजा मामला कनीमोझी करुणानिधि के उस पत्र से जुड़ा है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की सांसद कनीमोझी ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर अपने दल के सांसदों के लिए कांग्रेस से अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की है। इस पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बदले हुए राजनीतिक हालात और कांग्रेस के साथ गठबंधन समाप्त होने के बाद अब साथ बैठना उचित नहीं होगा।

संसद में सीट व्यवस्था पर सियासी संदेश

संसद के भीतर सांसदों की सीट व्यवस्था सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन जब कोई बड़ा सहयोगी दल सार्वजनिक रूप से अलग बैठने की मांग करता है, तो उसके राजनीतिक मायने भी निकाले जाते हैं। कनीमोझी के पत्र को केवल सीट बदलने का अनुरोध नहीं, बल्कि विपक्षी गठबंधन के भीतर बढ़ती दूरी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद के भीतर बैठने की व्यवस्था कई बार राजनीतिक समीकरणों का प्रतीक बन जाती है। ऐसे में डीएमके का कांग्रेस से दूरी बनाना विपक्षी एकता पर सवाल खड़े कर रहा है।

INDIA गठबंधन पर फिर उठे सवाल

INDIA Alliance की शुरुआत बड़े राजनीतिक उत्साह के साथ हुई थी। विपक्षी दलों ने इसे भाजपा के खिलाफ संयुक्त रणनीति का मंच बताया था। कई बैठकों और साझा बयानबाजी के जरिए विपक्ष ने एकजुटता का संदेश देने की कोशिश भी की थी।

लेकिन समय के साथ गठबंधन के भीतर मतभेद सामने आने लगे। सीट बंटवारे, क्षेत्रीय राजनीति और नेतृत्व को लेकर कई दलों के बीच असहमति की खबरें आती रहीं। अब डीएमके का यह कदम उन चर्चाओं को और हवा दे रहा है कि गठबंधन के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है।

कांग्रेस और डीएमके के रिश्तों पर असर?

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और डीएमके लंबे समय तक दक्षिण भारत की राजनीति में सहयोगी रहे हैं। खासतौर पर तमिलनाडु की राजनीति में दोनों दलों का गठजोड़ काफी मजबूत माना जाता रहा है। ऐसे में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग को केवल तकनीकी बदलाव नहीं माना जा रहा।

हालांकि अभी तक कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर कोई बड़ा आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे गठबंधन की कमजोर होती स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है।

राजनीतिक परिस्थितियों का हवाला

कनीमोझी द्वारा लिखे गए पत्र में “बदले हुए राजनीतिक हालात” का उल्लेख सबसे ज्यादा चर्चा में है। इस एक लाइन ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसे कौन से हालात बने कि डीएमके को संसद में अलग बैठने की मांग करनी पड़ी?

विश्लेषकों का कहना है कि क्षेत्रीय दल अब अपनी राजनीतिक पहचान को लेकर ज्यादा सतर्क नजर आ रहे हैं। कई दल नहीं चाहते कि उनकी स्वतंत्र राजनीतिक छवि किसी बड़े राष्ट्रीय दल के साथ पूरी तरह जुड़ी दिखाई दे। ऐसे में डीएमके का यह कदम अपनी अलग राजनीतिक लाइन दिखाने की कोशिश भी माना जा रहा है।

विपक्षी रणनीति पर पड़ सकता है असर

लोकसभा चुनाव के बाद विपक्षी दलों के बीच समन्वय बनाए रखना पहले ही चुनौती बना हुआ था। अब यदि सहयोगी दल सार्वजनिक रूप से दूरी दिखाने लगें, तो इसका असर विपक्ष की संयुक्त रणनीति पर भी पड़ सकता है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संसद के भीतर विपक्ष की ताकत केवल संख्या से नहीं, बल्कि एकजुटता से भी तय होती है। यदि सहयोगी दलों के बीच तालमेल कमजोर पड़ता है, तो इसका सीधा फायदा सत्तापक्ष को मिल सकता है।

सोशल मीडिया पर भी तेज हुई चर्चा

डीएमके के इस कदम के बाद सोशल मीडिया पर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसे गठबंधन टूटने की शुरुआत बता रहे हैं, तो कुछ इसे केवल संसदीय व्यवस्था से जुड़ा सामान्य मामला मान रहे हैं।

हालांकि इतना तय है कि इस घटनाक्रम ने INDIA गठबंधन की एकजुटता पर नए सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में कांग्रेस और डीएमके के रिश्तों को लेकर क्या तस्वीर सामने आती है, इस पर देश की राजनीति की नजरें टिकी रहेंगी।

फिलहाल, विपक्षी राजनीति में यह संदेश साफ दिखाई दे रहा है कि गठबंधन बनाना जितना आसान होता है, उसे लंबे समय तक एकजुट बनाए रखना उतना ही कठिन।

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