पसगवां में बंदरों का बढ़ता आतंक, जनजीवन बेहाल—प्रशासन की उदासीनता पर उठ रहे सवाल
ब्यूरो चीफ लखीमपुर खीरी – नीरज कुमार
लखीमपुर खीरी। पसगवां क्षेत्र में बंदरों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे आमजन का रोजमर्रा का जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। खेतों से लेकर घरों तक बंदरों का उत्पात इस कदर बढ़ गया है कि लोग भय और तनाव में जीवन जीने को मजबूर हैं। फसलों को भारी नुकसान पहुँचने से किसानों की कमर टूट रही है, वहीं बच्चों और बुजुर्गों पर हमले की घटनाएँ डर को और बढ़ा रही हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, बंदर आए दिन खेतों में घुसकर गेहूं, सरसों और सब्जियों को बर्बाद कर देते हैं। इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ रहा है और उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। गांव के कई परिवारों में तो हालात इतने गंभीर हैं कि बच्चों को अकेले बाहर खेलना तक मुश्किल हो गया है। कई बुजुर्गों और बच्चों को बंदरों द्वारा काटे जाने की घटनाएँ भी सामने आ चुकी हैं, जिससे स्वास्थ्य जोखिम बढ़ गया है।
सुरक्षा के लिए ग्रामीण अपने घरों की खिड़कियों और आंगनों में लोहे के जाल लगवाने को मजबूर हैं। ये उपाय कुछ हद तक राहत देते हैं, पर समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं। दूसरी ओर, प्रशासन की नाकामी और उदासीनता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। धार्मिक आस्था से जुड़े बंदरों पर कार्रवाई करने में प्रशासन हिचकिचाता नजर आ रहा है, जबकि जनजीवन और संपत्ति की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि वे कई बार इस मुद्दे को अधिकारियों के सामने उठा चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक और व्यवहारिक उपाय अपनाकर इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। वन विभाग की मदद से बंदरों को नियंत्रित करना, सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वास, या आधुनिक तकनीक के उपयोग से उन्हें आबादी से दूर रखना जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं।
यह समस्या केवल किसानों का आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि समाज और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। ऐसे में प्रशासन को धर्म के बहाने पीछे हटने के बजाय जनहित को प्राथमिकता देते हुए तत्काल एक प्रभावी रणनीति बनानी चाहिए। सामुदायिक सहभागिता और वैज्ञानिक उपायों के साथ ही पसगवां के लोगों को इस संकट से राहत मिल सकेगी और वे दोबारा सुरक्षित माहौल में जीवन जी पाएंगे।
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